Ambedkar Jayanti in Pakistan

Ambedkar Jayanti in Pakistan
Ambedkar Jayanti in Pakistan

Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar, popularly known as Baba Saheb Ambedkar, was a towering figure in India’s struggle for independence and social justice. Born into a family of Mahar caste, which was considered “untouchable” in the caste hierarchy, Ambedkar experienced discrimination and prejudice from an early age. However, he was a brilliant student and went on to earn several degrees, including a PhD from Columbia University in the United States.

Ambedkar was a social reformer who fought against the caste system and untouchability, which were deeply entrenched in Indian society. He believed that caste was a social evil that divided people and prevented them from achieving their full potential. He also advocated for the rights of women and other marginalized groups, such as the Adivasis and the Dalits.

One of Ambedkar’s most significant contributions was his role in drafting the Indian constitution. As the chairman of the Constituent Assembly’s drafting committee, he played a pivotal role in shaping India’s political and social landscape. The constitution, which was adopted on January 26, 1950, included several provisions for social justice, such as the reservation of seats in educational institutions and government jobs for Dalits and other disadvantaged communities.

Ambedkar was also a prolific writer and thinker, and his writings continue to inspire people today. He believed that education was the key to social reform and worked tirelessly to establish educational institutions for Dalits and other marginalized groups. He was also a strong advocate for democracy, human rights, and individual freedom.

Baba Saheb Ambedkar Jayanti is celebrated with great enthusiasm in India and among the Indian diaspora around the world. On this day, people pay tribute to his memory by organizing seminars, lectures, and cultural programs. His message of social justice and equality remains relevant today, and his legacy continues to inspire people to fight against discrimination and prejudice.

Ambedkar Jayanti is a public holiday in India that is celebrated annually on April 14th to commemorate the birth anniversary of Dr. B.R. Ambedkar, who was an Indian jurist, economist, and social reformer.

As for Pakistan, Ambedkar Jayanti is not a recognized holiday as Dr. B.R. Ambedkar was not a prominent figure in Pakistan's history. However, there are individuals and organizations in Pakistan who do recognize and celebrate his contributions towards social justice, equality, and human rights.

Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar, also known as Babasaheb Ambedkar, had expressed his views on the issue of the partition of India and the creation of Pakistan. In his book, “Pakistan or the Partition of India,” he argued that the partition was a mistake and that it would lead to more problems than solutions.

Ambedkar believed that the idea of creating a separate Muslim state was based on flawed assumptions and that it would not solve the underlying problems of religious and communal tensions in India. He argued that the creation of Pakistan would only deepen the divisions between Hindus and Muslims and that it would be detrimental to the interests of both communities.

Ambedkar was also critical of the two-nation theory, which argued that Hindus and Muslims were separate nations and could not coexist in a single country. He believed that this theory was based on a narrow and divisive understanding of India’s history and culture and that it would lead to the fragmentation of the country.

Overall, Ambedkar was a strong advocate for a united and secular India, where people of all religions and castes could live together in peace and harmony. While he recognized the challenges posed by communal tensions and religious differences, he believed that these could be addressed through democratic means and social reform rather than through the creation of separate states based on religious identity.

In his book, Ambedkar also criticized the Muslim League’s demand for a separate state of Pakistan, arguing that it was based on a flawed understanding of the political and social realities of India. He believed that the League’s demand was driven by a desire for political power and that it would only lead to the further marginalization of Muslims in India.

Ambedkar was also critical of the Indian National Congress’s handling of the issue of partition, arguing that the party’s leadership had failed to anticipate the consequences of dividing the country along religious lines. He believed that the Congress had made several strategic errors in its negotiations with the Muslim League and that it had underestimated the depth of communal tensions in India.

Despite his criticisms of the partition, Ambedkar was a strong supporter of the Indian constitution and worked tirelessly to ensure that it reflected the values of democracy, secularism, and social justice. He believed that the constitution was the best hope for a united and democratic India and that it could help to overcome the divisions that had led to the partition.

Overall, Ambedkar’s views on Pakistan were shaped by his commitment to a united and secular India, where people of all religions and castes could live together in peace and harmony. While he recognized the challenges posed by communal tensions and religious differences, he believed that these could be addressed through democratic means and social reform rather than through the creation of separate states based on religious identity.


पाकिस्तान और भारत के विभाजन नामक पुस्तक डॉ. बी. आर. अम्बेडकर द्वारा लिखी गई थी, जो स्वतंत्र लेबर पार्टी (ILP) की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष थे। उन्होंने इस पुस्तक को लिखने के लिए एक समिति की नियुक्ति की थी, जो पाकिस्तान के विषय में रिपोर्ट तैयार करने के लिए बनाई गई थी। इसका उद्देश्य था कि ILP को यह तय करने में मदद मिले कि क्या वे मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव में उल्लिखित पाकिस्तान की योजना के समर्थन में होना चाहिए या नहीं। यह पुस्तक 1940 में तैयार की गई थी और दिसंबर में पहली बार प्रकाशित की गई थी। दूसरे संस्करण में कुछ अद्यतन सहायक खाते शामिल किए गए थे, जो फरवरी 1945 में प्रकाशित किए गए थे, और तीसरे संस्करण को 1946 में प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक को बहुत लोगों ने ध्यान से पढ़ा था। इस पुस्तक का मूल उद्देश्य था कि वह उन भारतीयों की मदद करे जो पाकिस्तान की जटिल समस्या का सामना कर रहे थे।

यह पाठ बताता है कि बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा लिखी गई पुस्तक “उन भारतीयों की सेवा करने वाली” पाकिस्तान की समस्या से जुड़ी थी और इससे विशेष रूप से श्री गांधी और श्री जिन्ना ने इसे उद्धृत किया था। इस पुस्तक का मूल्य परामर्श करने और उससे लाभ उठाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। यह लेख डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के लेखन और भाषणों के खंड 8 पर आधारित है जो महाराष्ट्र सरकार द्वारा 1990 में प्रकाशित किया गया था।

यह पुस्तक अम्बेडकर के विचारों का एक महत्वपूर्ण संग्रह है जो उनकी दृष्टि को समझने में मदद करता है। इस पुस्तक में अम्बेडकर पाकिस्तान के बारे में विभिन्न विकल्पों का आकलन करते हुए उसके संबंध में उनके विचार और उनकी व्यवहार्यता पर चर्चा करते हैं। उन्होंने इस पुस्तक में अपने विचारों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है जो पाकिस्तान के लिए विभिन्न विकल्पों के संबंध में उनकी विचारधारा को समझने में मदद करते हैं।

इस पुस्तक में अम्बेडकर ने पाकिस्तान के निर्माण से संबंधित विभिन्न समस्याओं के बारे में भी विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने इस पुस्तक में एक विशिष्ट अध्याय में मालाइज के बारे में भी लिखा है, जो उनके विचारों के बारे में एक नए आयाम का प्रस्ताव देता है।

अम्बेडकर के इस उद्धरण से स्पष्ट होता है कि उन्होंने पाकिस्तान के विषय में तार्किक विचार और आत्मनिर्णय के महत्व को समझा था। उन्होंने इस सवाल के फैसले को हिंदू और मुस्लिमों के अपने हाथों में सौंपने की मांग की है और बल और प्रतिरोध के निरर्थकता को समझाया है। इस तरह से, उन्होंने भारतीय समाज को यह संदेश दिया है कि वे आत्मनिर्णय के महत्व को समझते हैं और उन्हें किसी भी स्थिति में अपने आत्मनिर्णय के लिए लड़ने की आवश्यकता होती है।

उन्होंने इस सवाल को एक मानवता और न्याय के मुद्दे के रूप में भी देखा है। उन्होंने कहा है कि किसी को भी आत्मनिर्णय से वंचित नहीं किया जा सकता, जिसमें मुस्लिम भी शामिल हैं। यह उनके विचारों का एक बड़ा हिस्सा है, जो उन्होंने सदैव न्याय और मानवता के मूल्यों को उजागर करने के लिए उठाए थे।

अम्बेडकर ने भारत के संविधान निर्माता के रूप में भारतीय संविधान की तैयारी में अपना जीवन लगाया था। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लिए समानता और न्याय के मूल्यों के आधार पर संविधान की रचना की थी। उन्होंने भारत के अखंडता और एकता को महत्वपूर्ण मानते थे और उन्हें एक केन्द्रीय सरकार की आवश्यकता समझ में आती थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि संविधान में राज्यों को स्वतंत्रता दी जाने की अनुमति होनी चाहिए, लेकिन उन्होंने एक केन्द्रीय सरकार की जरूरत को भी समझाया था।

उन्होंने भी समझाया था कि पाकिस्तान के बनने से पहले भारत में मुस्लिम जनसंख्या के अधिकांश हिस्से भारत में ही रहते थे और उन्हें समानता और न्याय के मूल्यों के अनुसार संविधान के माध्यम से सुरक्षित रखना चाहिए।

यह एक विवादास्पद मुद्दा है जो भारत और पाकिस्तान के बीच चलता आ रहा है। हालांकि, इस मुद्दे का समाधान करना बहुत मुश्किल है क्योंकि यह एक धार्मिक तथा सामाजिक मुद्दा है जो दोनों देशों की राजनीति को बहुत हद तक प्रभावित करता है।

एक केन्द्रीय सरकार के समर्थकों के मुताबिक, देश को एकीकृत रखना और सामान्य विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है। वे इस मामले में एक संप्रभु राज्य की बजाय जातिगत रूप से समरूप प्रशासनिक क्षेत्रों के निर्माण को समर्थन करते हैं।

दूसरी ओर, मुस्लिम मामले के समर्थक इस बात से सहमत हैं कि मुस्लिम समुदाय के हितों को सुनिश्चित करने के लिए एक अलग संप्रभु राज्य की आवश्यकता है। उनके मुताबिक, हिंदू मुस्लमानों के बीच जातिगत भेदभाव अनगिनत मुद्दों का कारण बनता है और इसे दूर करने के लिए अलग-अलग राज्यों का गठन एक संभव समाधान हो सकता है।

आपका दावा सही है कि उत्तर-पश्चिम में प्रांतों को जोड़ने का विचार अतीत में कई बार सरकार द्वारा विचार किया गया था और बंगाल को 1905 में सांप्रदायिक आधार पर विभाजित किया गया था।

लेकिन इससे कुछ समझ नहीं आता है कि इससे लीग की दृष्टि किस तरह से चौंकाने वाली नहीं हो सकती है। पाकिस्तान और भारत के बीच एक बहुत बड़ी सीमा है और दोनों देशों में समूचे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संरचना अलग-अलग हैं। दोनों देशों के लोगों की सोच और विचारधारा भी अलग-अलग हैं।

इसलिए, यह बहुत मुश्किल हो सकता है कि एक संभव पाकिस्तानी राज्य कैसे बनाया जा सकता है जो कि केवल मुस्लिमों के लिए हो। इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि हम संवैधानिक मानदंडों और न्यायपालिका का पालन करें जो देश के सभी नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करता हो।

आप अधिक संदर्भ के बिना बात कर रहे हैं लेकिन मुझे लगता है कि आप देश के इतिहास और संविधान के बारे में बात कर रहे हैं। आपके द्वारा उठाए गए तीन बिंदुओं पर विचार इस तरह हो सकते हैं:

  1. भारत में नस्लीय समानता और भाषाई एकता जैसी दृष्टियों का समर्थन करना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे हिंदू धर्म और मुसलमान धर्म के बीच सामाजिक भेद के खिलाफ लड़ाई के लिए उपयोग में लाना चाहिए।
  2. भारत एक ही राष्ट्र है और इस बात को हमेशा सुनिश्चित करना चाहिए कि हम एक-दूसरे के साथ शांति और समझौते के साथ रहते हैं।
  3. भारत के इतिहास के बारे में सोचते समय, हमें यह समझना चाहिए कि भारत का इतिहास बहुत विविध है और हमें एक दूसरे के साथ और अन्य देशों के साथ शांति और समझौते की जरूरत है।

यह सत्य है कि भारत में मुसलमान एक विशिष्ट समूह हैं और उन्हें अपने समूह से संबंधित होने की लालसा है। भारत के इतिहास में हिंदू और मुसलमानों के बीच दुश्मनी के कई मामले हुए हैं, जो उनकी मांग को समझने में मदद करते हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान की मांग के आधार पर एक मुस्लिम राष्ट्र की मांग करना बहुत महत्वपूर्ण है।

यह समझना आवश्यक है कि इस मामले में सिर्फ एक समुदाय के इतिहास को देखते हुए नहीं बल्कि भारत के संवैधानिक और राजनीतिक संरचना को समझते हुए देखना होगा। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जिसमें सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार होते हैं। भारत के संवैधानिक संरचना में एक मुस्लिम राष्ट्र के गठन की कोई धारणा नहीं है।

इस संदर्भ में, पाकिस्तान की मांग असम्भव है क्योंकि भारत का संवैधानिक संरचना इसे स्वीकार नहीं करती है। दोनों देशों के बीच संबंध बदले बिना इस मामले में सुलझाव नहीं हो सकता है।

एक राष्ट्र के निर्माण के लिए केवल वैधता ही नहीं, बल्कि इसे वास्तविकता में लाने के लिए इच्छाशक्ति भी आवश्यक होती है। हालांकि, मुस्लिमों की कई वैध शिकायतें हैं जो अनदेखी नहीं की जा सकतीं। वे दावा करते हैं कि “संवैधानिक सुरक्षा उपाय हिंदू बहुमत के अत्याचार से उन्हें बचाने में विफल रहे हैं” (42)। मुस्लिमों के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लीग को स्वीकार करने से (जो प्रतिनिधि के मानदंड के विपरीत है) और कांग्रेस के भय से कांग्रेस प्रांतों में लीग के साथ गठबंधन मंत्रालयों का गठन नहीं करने से ये चिंताएं और बढ़ गई हैं। मुसलमानों की कम प्रतिनिधित्व जारी रहेगी। ब्रिटिश शासन के दौरान मुसलमानों का स्वामी के साथी-प्रजा के स्तर से पतन हो गया था, और अब उन्हें डर है कि उन्हें हिंदू सामान्य जनता के स्तर तक सीमित कर दिया जाएगा।

हिंदू लोग पाकिस्तान की योजना का विरोध करते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है:

(a) यह भारत की एकता को तोड़ देगा,

(b) यह भारत की सुरक्षा को कमजोर करेगा, और

(c) यह साम्प्रदायिक समस्या को हल नहीं करता है।

हिंदू लोग दावा करते हैं कि आज के भारत का पूरा क्षेत्र हमेशा से एक रहा है। लेकिन यह तथ्य विवादास्पद है, और हुआन त्सांग के समय एक थोड़ी सी अस्पष्ट धारणा एक देश के बारे में थी, जो इतिहास है और अब की स्थिति अलग है, इतिहास को बतौर आधार लेना कुछ सावधान नहीं है। मुस्लिम आक्रमण के बाद भारत के बहुत से हिस्सों पर मुस्लिम शासन रहा था, लेकिन वे हिंदूधर्म को उखाड़ने और किसी भी माध्यम से इस्लाम स्थापित करने के लिए तैयार थे – ज्यादातर बार हिंसक ढंग से।

अम्बेडकर लिखते हैं, “[t]his bitterness, between the two, is so deep-seated that a century of political life has neither succeeded in assuaging it; nor in making people forget it” (64). उत्तर भारत (उत्तर-पश्चिम, मुख्य रूप से) भारत की तुलना में एक ट्रेन में एक वैगन जैसा रहा है जो बार-बार भारत के बाकी हिस्से से जुड़ा और अलग होता रहा है (64-65)। इसके अलावा, “भौगोलिक एकता…एकता नहीं है… [यह] प्रकृति द्वारा इच्छित एकता है…जहां प्रकृति प्रस्तावित करती है वहां मनुष्य व्यवस्था करता है” (65)। प्रशासनिक एकता भी एकता नहीं है, क्योंकि यह समय-समय पर एकता होती है। इसलिए, अगर कोई सच्ची एकता मौजूद नहीं है, तो इसके विस्फोट का सवाल ही नहीं है।

पाकिस्तान के निर्माण से सुरक्षा कमजोर होने के बारे में संबंधित चिंताएं हैं। इसके बारे में तीन तर्क हैं। पहला तर्क है कि पाकिस्तान के निर्माण से हिंदुस्तान के बिना वैज्ञानिक सीमा रह जाएगी। लेकिन वास्तव में, (i) कुछ भी वैज्ञानिक सीमा नहीं होती है, और (ii) भारत के पास भी कोई नहीं है। इसके अलावा, (iii) वास्तविक बंदोबस्त द्वारा सुरक्षा को नहीं खतरा होता है। हिंदुओं को संसाधनों के वितरण के सवाल पर चिंता है, लेकिन हिंदुस्तान के पास क्षेत्रफल, जनसंख्या या राजस्व के मामले में पाकिस्तान से अधिक संसाधन होंगे।

सशस्त्र बल का मुद्दा एक और चिंता का विषय है। अंबेडकर के समय में, भारतीय सेना बड़े हिस्से में पंजाबी मुसलमानों द्वारा बनाई गई थी, जिसे अधिकतर हिंदुओं द्वारा दिए गए करों से उत्पन्न किया गया था। वे ब्रिटिश शासन के तहत वफादार हैं, लेकिन वे हिंदुओं के तहत इतने वफादार नहीं रहेंगे, जिन्हें वे नीचा समझते हैं और पश्चिम से भारत पर किसी भी मुस्लिम आक्रमण को रोकने के लिए वे असंभव हैं। हिंदुओं के पास एक मुश्किल विकल्प है: एक सुरक्षित सेना होना या सुरक्षित सीमा होना और जब सोच विचार करें, तो दोनों में से पहले वाला अधिक महत्वपूर्ण होता है, हिंदु ने पाकिस्तान की मांग स्वीकार करनी चाहिए और स्वतंत्र होने के बाद अन्य भागों से अपनी सेना बनानी चाहिए जो किसी भी तरह से कमजोर सैनिकों का प्रभाव नहीं डालती हैं।

यह कि ब्रिटिश आज पंजाबियों को सेना में भर्ती करते हैं, अन्य हिंदुस्तानी जातियों की सैन्य अधिकतम अयोग्यता का सबूत नहीं है, इस बात को ध्यान में रखते हुए, ब्रिटिश दूसरे समयों में भी उन्होंने उनसे भारी संख्या में भर्ती की थ।

अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान साम्प्रदायिक समस्या को हल कर सकता है।

मुस्लिम लीग की सार्वभौमिकता विरोधी विरोध के बावजूद, अलग मतदाता, अनुपातिक प्रतिनिधित्व और मुस्लिम अधिकतम प्रांतों में कानूनी बहुमत की सभी मांगें स्वीकृत की गईं। अधिकतर हिंदुओं की विरोध के बावजूद प्रतिनिधित्व की अधिकता के अधिकार के तहत हिंदुत्व वाले प्रांतों में देंगे गए मांगों को कोई व्यवाहारिक न्याय नहीं है। क्योंकि हिंदू इस संकल्प के खिलाफ हैं। मुस्लिम जानते थे कि एक विभाजित हिंदू बहुमत के तहत उन्हें कुछ नहीं खोना है, जबकि एक एकजुट मुस्लिम बहुमत के तहत हिंदुओं को बहुत कुछ खोने का खतरा होता है। इस प्रकार, मुस्लिम शासन पहले से ही मुस्लिम अधिकतम प्रांतों में हिंदू माइनॉरिटियों पर लगा दिया गया है।

287 thought on “Ambedkar Jayanti in Pakistan”
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